Saturday, June 4, 2011

भेड़िया









भेड़िया आया, भेड़िया आया
शोर सुनाई नहीं देता
क्योंकि
भेड़िया खास नहीं रहा
आम हो गया है
पहले आता था
कभी-कभी
जंगलों से
रिहायशी इलाकों में
लेकिन
बना लिया आशियाना
कंक्रीट के जंगलों में
बदल गया है
चेहरा भेड़िए का
लेकिन
नहीं बदला है
तरीका शिकार का
जांघ पर हमला
घायल को थकाना
फिर भूख मिटाना
एक नहीं
दो नहीं
तीन नहीं
सैकड़ों भेड़िए
मौजूद हैं
इस बस्ती में
इसीलिए तो
भेड़िया आया, भेड़िया आया
शोर सुनाई नहीं देता
क्योंकि 
भेड़िया खास से
आम हो गया है

11 comments:

  1. अच्छी रचना , लिखते रहिये हम पढ़ते रहेंगे

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  2. हर जगह अब भेडिये ही हैं किसी न किसी रूप में ..अच्छी प्रस्तुति

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  3. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 07- 06 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

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  4. भेड़िया आम हो गया है ...सही कहा !
    अब उन्हें जंगलों की कहाँ जरुरत है , बीच शहर में बस गये हैं !

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  5. bhediyon ke bich ab bhediye ka darr kya dikhana ...

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  6. बेहतरीन रचना...

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  7. बहुत बहुत सही कहा....

    एकदम सटीक...

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  8. http://urvija.parikalpnaa.com/2011/06/blog-post_11.html

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  9. बेहतरीन और सटीक कटाक्ष आज के माहौल पर..

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  10. वाह सर सही पहचाना आपने....

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